मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

क्या हुआ कि नदी सुख कर 
दुबली होती जा रही,
क्या हुआ कि धरती 
आग भी उगलती जा रही ,
क्या हुआ कि मेघ 
रूठकर चलते बने ,
क्या हुआ कि हवा 
आंधी बनकर जाग उठी 
क्या हुआ कि सागर 
क्रोध में बौरा गया ,
क्या हुआ कि आदमी 
अपना ही दुश्मन  बन रहा ,
क्या हुआ कि प्रेम की
दुश्मन ही प्रेम बन रही ,
क्या हुआ कि ...........

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

                         आओ चलें गणतंत्र दिवस है 
चारो ओर गणतंत्र दिवस की तयारी हो रही है. खासकर स्कूलों में काफी उत्साह है. अच्छा लगता है बच्चों का उत्साह देखकर और याद आ जाता है अपना दिन. देश भक्ति गीतों से मान में रोमांच भर जाता था. हम भी काफी तैयारी करते थे इस दिन की लेकिन समय के साथ जो बदलाव आया है वह मन को ब्यथित कर देता है. लोगों में अब गणतंत्र दिवस के लिए औपचारिकता मात्र रह गयी है. हाँ वैसे लोग भी हैं जो आज भी देशप्रेम से भरे हैं और इस दिन का सम्मान करते हैं पर यह भी सही है कि बहुत सारे लोग इस दिन छुट्टियाँ मनाने बाहर चले जाते हैं . उनके लिए यह दिन कोई महत्व नहीं रखता और कई तो यह भी नहीं जानते कि इस दिन का क्या महत्व है. जिस तिरंगे के लिए हमारे देश के वीरों ने अपनी जान गवां दी और यातनाओं को हँसते हँसते सहे,  उस तिरंगे को बस हमें संभालकर सम्मान से रखना है. क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम भी अपना योगदान दें और देश के लिए थोड़ा समय निकालकर अपने तिरंगे को सलामी दें. बस हमारा थोड़ा सा समय हमारी अगली पीढ़ी के लिए एक सीख होगी कि वे भी हमारी परम्परा को आगे बढ़ाएं . यह तिरंगा हमसे कुछ नहीं मांगता बल्कि हमें ही पहचान देता है कि हम भारतीय हैं, तो हमें भी उसके सम्मान के लिए स्वेच्छा से आगे बढ़ना होगा . हमारा यह कदम मात्र सरकारी आदेश न हो बल्कि हमारी स्वयं कि इच्छा हो. तो आओ कदम बढ़ाएं और तिरंगे और हमारे संविधान के सम्मान में खुद को भी शामिल होने का गर्व प्राप्त करें .

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

                                             हैप्पी मकरसंक्रांति 
 नये साल में हिन्दू धर्म का पहला त्यौहार . १४ जनवरी को यह पर्व एक तरह से फिक्स हो गया है . हिन्दू  पंचांग के अनुसार इस साल १५ जनवरी को यह पड़ता है लेकिन अधिकतर लोग  आज ही मना रहे हैं. मेरे आस - पास तो आज ही मनाया जा रहा है. ये लोग कह रहे हैं कि करना क्या है, गंगा में डुबकी लगाना है और दही-चूरा खाना है तो आज हो या कल , क्या फर्क पड़ता है.
              इस साल की ठंढ  ने हाड़ कंपा दी है . कई बुजुर्ग तो भगवान के प्यारे हो चुके हैं और कई इस इंतजार में हैं की कब उनका बुलावा आता है. हमारे बिहार के मुख्यमंत्री की माँ भी इसी ठंढ में उन्हें छोड़ कर चली गयी . हर साल ठंढ में  मै कम्बल दान करती हूँ और सबसे पहला कम्बल मेरे घर की पुरानी काम वाली को देती हूँ. हमलोग उसे दादी कहते हैं. अब वो काम नहीं करती है लेकिन अक्सर हमारे घर आती रहती है और हम उन्हें हमेशा कुछ न कुछ  देते रहते है. इस बार काफी  दिन से दादी नहीं आई थी और सब ने येही मान लिया था की वो मर गयी होगी लेकिन आज जब दही चूरा लेने वो पहुंच गयी तो सब की आँखे फटी की फटी रह गयी. "अरे ! बुढ़िया अभी जिन्दा है ." सबके मुंह से यही निकला . मैं पूछी कि "दादी अबकी ठंढा भी डरी गेले तोहरा से ". दादी की पोपली हंसी ने पुनह रोमांच भर दिया और सूरज भी उनका साथ देने के लिए मेरे आँगन में झाँकने लगे , धूप अच्छी रही आज .

शनिवार, 1 जनवरी 2011

                      शब्द तो है लेकिन वाणी नहीं है 

काश कि वक्त ठहर पाता. बहुत सारी उम्मीदे थी लेकिन अधूरी रह गयी. पता नहीं क्यों समय को भागने नहीं देना चाहती . संभव तो नहीं है यह सब फिर भी कुछ शिकायतें रह जाती हैं . मैं खुद से हमेशा यही  बोलती हूँ  कि  ए जिन्दगी तु आगे बढ़ रास्ते और भी हैं . मंजिलें और भी हैं . एक  कदम आगे तो बढ़ा. मंजिल जरुर मिलेगी. 
                      उम्मीदों के साथ नए साल का स्वागत करने मैं भी पहुँच गयी वहां जहाँ लगी थी बच्चों की कला की प्रदर्शनी . काफी अच्छा लग रहा था मुझे लेकिन एक बच्ची की कला ने मुझे वही तक सीमित कर दिया जहाँ वो थी. मै पूछ उठी कुछ अपनी पेंटिंग के बारे में तो बताओ . कागज पर वह लिखती है "शब्द तो बहुत हैं  पर वाणी नहीं है." मेरी नजरें उसके चेहरे पर ही टिक गयी लेकिन वह न तो विचलित हुयी और न ही उदास. समझौता  कर  चुकी थी खुद से . उसकी हिम्मत ने मुझे नयी उर्जा से भर दी कि बुलंद हौसले सफलता कि नयी कहानी जरुर लिखते हैं .

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

अंग्रेजी शब्द नियर और भोजपुरी शब्द नियरे बा में साम्यता

यह तो अजीब संजोग है कि अंग्रेजी का नियर हमारे नियर बा से मिलता है. तर्क यह दिया जाता है कि आकस्मिक संजोग है तो यह भी तर्क दिया जाता है कि अंग्रेजी और हमारे देश की भाषा एक ही कुल की है. संभव तो और भी बहुत हो सकता है लेकिन गर्व इस बात  की है कि अंग्रेजी को सभ्य भाषा मानने वाले और उसे अधिक महत्व देने वाले भी यह जान ले कि हमारी भाषा भी कम समृद्ध नहीं है. संभव हो अंग्रेजों ने हमारे नियर बा कि चोरी कर अपने में मिला लिया हो.

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

प्रयत्न 
लहरें, बार-बार
किनारे से टकराकर 
लौट जाती हैं ,
पुन:  आती हैं 
उसी वेग से 
सहस   के साथ  
निडर होकर  
पुन: लौट जाती है 
विवश होकर 
समझौता कर लेती हैं 
परिस्थितियों से 
पर प्रयत्नशील रहती हैं 
इसी आशा में 
कि मंजिल अवश्य मिलेगी 
यद्यपि 
बार- बार वे चोट खाती हैं 
अन्दर पीड़ा महसूस करती हैं 
पर अपनी व्यथा 
व्यक्त नहीं करती 
किनारे जब अभिमानी होकर 
चुनौती देते हैं
तब वे भी 
गर्जना करती हैं 
पर उनके समक्छ
कभी झुकती नहीं 
प्रत्न्शील रहती है 
इसी आशा में 
कि सफलता अवश्य मिलेगी.    

बुधवार, 24 नवंबर 2010

अपनी बातें

पता नहीं कुछ बातें इतनी गहरी चोट क्यों पहुचती हैं या फिर हमारी सोंच का नजरिया ही अलग हो । आशावादी हूँ पर हूँ तो इंसान। मुझमे भी शांत नदी की जलधारा के समान गुण है तो समुद्र के समान प्रचंड वेग भी। हिम्मत ने मुझे संघर्षरत बनाये रखा है , शायद मंजिल अभी और हो।
तीस नवम्बर को शादी की दसवी सालगिरह होगी , बहुत कुछ पायी अब तक जीवन में , उम्मीद से भी अधिक शायद। इसी तारीख को डॉक्टरेट की डिग्री भी पायी। यह तारीख मेरे लिए काफी महतवपूर्ण बन चुका है। अतः मेरी उम्मीद काफी अधिक हो गयी है इस तारीख से। पाने और खोने के साथ भी जीवन चलता रहता है, रास्ते मिलते है अनेक पर मन की आवाज हमें जिस ओर ले जाती है हम उधर ही निकल पड़ते हैं। हम दोनों एक दूसरे का हाथ थाम कर ही चलते हैं लेकिन मुझे इंतजार है उसका जो पीछे से मेरा आँचल पकड़कर माँ बोले .....................पता नहीं कब वो आएगा या फिर ..........................