सोमवार, 23 जून 2014


                                                                    बेवफाई 




बहुत खुश थी चिड़ी अपने चिड़े के साथ। पेड़ों पर फुदकना और फिर बालकनी में आकर अपने चिड़े के साथ खेलना बहुत पसंद था उसे। दरवाजे पर लगे आम्रपाली के छोटे से पेड़ पर था उसका छोटा सा आशियाना ,जिसमे उसकी दुनिया हम इंसानों से अधिक सुन्दर लगती थी मुझे। सोंचती कि काश ! हम भी इन्हीं की तरह बेपरवाह जिंदगी जीते और अपने प्यार भरे रिश्ते में बहुत ही खुश रहते लेकिन हम इंसान तो मोह -माया , लोभ -लालच , ईर्ष्या , तृष्णा सभी मानवीय गुणों से भरे है। हमारी जिंदगी इतनी बेपरवाह कहाँ ……… 
                        वक्त ने करवट बदली और चिड़ी की खुशहाल जिंदगी में शायद मेरी ही नजर लग गयी। चिड़ा को एक नयी दोस्त मिल गयी। दिनभर उसके साथ ही वह मशगूल रहता और इधर चिड़ी उदास चहकना भूल गयी। अब वो बालकनी पर आती लेकिन अकेले। चुपचाप दाने चुगती और मौन ही वापस चली जाती। मैंने उसके घोंसले में किसी तरह की हलचल नहीं सुनी लेकिन वह नया घोंसला  गुलजार रहता। मन करता उस नए घोंसले को उजाड़ दूँ और चिड़ी से बेवफाई का बदला ले लूँ पर रुक गयी ये देखने के लिए कि चिड़ी में कितनी सहनशीलता है। उसका व्यवहार हम इंसानों की तरह चिड़चिड़ा नहीं हुआ , बल्कि उसने अपने चिड़े को भरपूर आजादी दे रखी थी। कभी नहीं शिकायत करती उसकी बेवफाई का , भले ही अपना दर्द अकेले झेल रही थी। 
               कुछ दिनों बाद चिड़ी ने अपना ठिकाना बदल लिया और बरामदे में टंगे पोस्टर के पीछे अपना नया आशियाना बना लिया। अपनी दुनिया में वह फिर मगन हो गयी। जीवन को नए सिरे से ढालने में उसे तकलीफ तो जरूर हुई होगी लेकिन उसने हौसला बनाये रखा। इतनी हिम्मत ने बहुत कुछ सीखा दिया हमें फिर भी मैं चिड़े के प्रति अपनी इंसानी नफरत नहीं छोड़ पायी क्यों ……………… ? 

बुधवार, 14 मई 2014


  • भगवान बुद्ध 
सांसारिक   दुखों  द्रवित एक बालक सिध्दार्थ की कठीन जीबन यात्रा , सत्य कि खोज , प्राणि मात्र के प्रति दया एवं करुणा और इस सफर मे मिलने  वाली कठिनाइयों तथा मार्ग की बाधाओं आदि कुछ भी  तो नहीं  रोक पायी। बढ़ते हुए कदम हर उस रस्ते की  ओर स्वयं चल पड़ते जो ज्ञान की  खोज में सहायक होता। सफलता प्राप्ति हेतु असफलता के कटु स्वाद को चखना और मनन करना भी आवश्यक  होता  है। सोना पहले तपता है तभी अपना स्वरुप प्राप्त करता है। बालक सिध्दार्थ ने अपनी यात्रा  में जीवन की समस्त कठिनाइयों को अपनाया परन्तु यदि विचलित होते तो सिध्दार्थ से भगवान बुद्ध नहीं  बन पाते और तब न ही विश्व भारत को अपना  गुरु देश मानता। 
                 सागर से विशाल ह्रदय में आंदोलित करती लहरों के साथ उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर अनवरत चलने का प्रयत्न किया और सफलता ने उनके कदम चूमे। बाधाएं स्वयं रास्ता देकर उनका स्वागत करने लगी और शांत चित्त गौतम ने सभी को अपना साथी बनाते हुए मानव मात्र के  कल्याण हेतु जो मार्ग चुना सिर्फ  उसी पर चलते रहे। 
                 ऐसा नहीं है कि समाज  ने उनपर उँगली नहीं उठायी  होगी क्योकि जब उन्होंने प्रथम बार सुजाता का खीर  ग्रहण किया होगा तब लोगों ने उन्हें लोभी महात्मा  कहा होगा। उनके पवित्र चरित्र पर कीचड़ भी उछाले होंगे। यही परिस्थिति तब भी पैदा हुयी होगी जब उन्होंने आम्रपाली नामक वेश्या का आतिथ्य स्वीकार किया होगा। उनके अनुयायी भी उन्हें पथभ्रष्ट मानने लगे , लेकिन स्थिर चित्त और तेजस्वी विचारधारा के आगे सभी नतमस्तक हो गये। 
                भगवान बुद्ध के चरित्र की विशेषता थी महिलाओं के प्रति सम्मान। उन्होंने अपने समय से आगे अपनी सोँच रखीं , हांलाकि इसमें उनके प्रिय शिष्य आनन्द का  महत्वपूर्ण योगदान था और इतिहास उनका सदैव आभारी रहेगा क्योकि उनके प्रयत्नो से ही भिक्षुणी सन्घ  की स्थापना हुई । हमारा समाज यही मानता रहा कि महिलाओँ को सन्घ  बनानें की  आजादी देना ,समाज को पतन के मार्ग  की ओर ले जाना है लेकिन भगवान बुद्ध ने इस मिथक को तोड़ समाज को एक नवीन संदेश दिया जो नारियों के सम्मान का सूचक आज भी है। 
              आज बुद्ध पूर्णिमा पर भगवान बुद्ध को कोटिशः नमन।  

मंगलवार, 6 मई 2014

सड़क पर तड़पती एक जिंदगी

सड़क पर तड़पती एक जिंदगी


मर गई मानवीयता 
मुँह फेर लेती इंसानियत 
तड़पती, विलखती जिंदगी 
दूर खड़ी तमाशबीन संवेदना 
सिमट कर रह गयी भावना। 

बना लिया है हमने 
एक निश्चित दायरा 
स्वयं से निकलकर 
स्वयं में ही मिलती 
हमारी जिंदगी। 

एक पल के लिये ठहरी 
पुनः गंतव्य की  ओर 
देख भर लिये हमने 
सड़क पर तड़पती 
एक जिंदगी ………… 


सड़क दुर्घटना पर लोगों की सुप्त मानवता से आहत मेरी ये रचना ……… 

शनिवार, 8 मार्च 2014

                             महिला दिवस रोज ही होता है 


महिला दिवस की शुभकामनाएँ…………… बधाईयाँ मिलती जा रही है। सोंचती हूँ क्या महिला दिवस के दिन महिलाओं के दिन की शुरुआत अलग ढंग से होती है ? मुझे तो नहीं लगता कि सुबह उठते ही महिलाओं को बेड टी के साथ बड़े प्यार से जगाया जाता हो और पति देव कहते हों आज किचन और बच्चे हम  ही सम्भाल लेते हैं।


कितने पति तो अखबार के साथ चाय की चुस्कियां लेते हुए जोर-जोर से पढ़ के सुनाते हैं कि आज महिला दिवस है एक काम करना पनीर दो प्याजा बना देना तुम्हें बहुत पसंद है न और साथ में शाही पुलाव बन जाए तो खाने का मजा ही आ जायेगा ................ उधर से बेटा  बोलता है........ मम्मी .... गरम -गरम कचौड़ियाँ बनाना मत भूलना ……… पापा बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलते हैं ....... अरे बेटा ये भी कोई बोलने की  बात है .... मम्मी और तुम्हारी पसंद नहीं बनाएगी……… हो ही नहीं सकता। 

अरे ! दादी इधर आओ आज महिला दिवस है और मम्मी कुछ स्पेशल बनाने वाली है ……सच ……लेकिन बेटा मैं और तेरे दादाजी तो सादा खाना ही खाते हैं , हमारे लिए तो बस सादी रोटी और सब्जी , अगर मन होगा तो बैगन का भरता भी बना देना बेटी तेरे बाबूजी कई दिनों से बोल रहे थे बनाने के लिए। 

क्या हो रहा है ………कुछ नहीं दादाजी आज महिला दिवस है ……… हाँ बेटा सो तो है………………… चल जा अपनी मम्मी को बोल सबके लिए गरमा-गरम चाय बनाये और मेरे पास आकर बैठे , कुछ पूछना है उससे। 

लीजिये बाबूजी आप सभी की  चाय हाजिर है …………… क्या पूछना है मुझसे ?
अरे बेटी महिला दिवस पर सेमिनार में जाना है और तेरी हिंदी तो अच्छी है सो कुछ लिख दे ,वही ले जाकर पढ़ देंगे……… 

क्या लिखें बाबूजी हर दिन की शुरुआत ही महिलाओं से होती है इसलिए रोज ही महिला दिवस है……… 

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

                                   ले आयी वसंत 

मुझे लगा वसंत मेरे घर इस बार नहीं आएगा ………मेरी दहलीज  से पार कर जायेगा और मैं यूँ ही मौन बैठी रह जाऊँगी ................... पर हार नहीं मानी ,..........  ले आयी अपने घर हौले से खुशियां भर देने की  उम्मीद के साथ.……… अपने उदास मन में पुनः स्फूर्ति भर देने के लिए ………बोल आयी कोयल को कुहुकने के लिए अपनी अमराइयों में ………जहाँ निकल आयी मंजरियाँ थिरकने को तैयार बैठी बस कोयल की  मधुर तान और  उनका झूम उठना ……… यही तो है जीवन का संचार और मैं बैठ गयी थी मौन ……… बना लिया था एक सीमीत दायरा ................ नहीं सुन पा रही थी बावरे वसंत की आह्ट ………… दरवाजे पर उसकी दस्तक ………… बगीचे में खिले रंगीन फूलों के बीच से सर्र से उसका निकलना ……… और मेरे खुले लम्बे बालों को छेड़ना ………मेरी खोयी हँसी .......... ले आयी वसंत ...................... . । 






बुधवार, 25 दिसंबर 2013

पापहारिणी सरोवर और मंदार पर्वत का अद्भुत स्वरुप


हाल ही में मैं किसी काम से बांका जिला जो भागलपुर से लगभग पचास किलोमीटर है, गई थी।  यही पर बौसी नामक स्थान पर मंदार  पर्वत और पापहारिणी सरोवर है। ऐसी मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान करने से सभी पाप धूल जाते हैं। सोंची मैं भी अपने  अबतक के सारे पाप धो ही लूँ। मेरे पति बोले लगता है आगे पाप करने का इरादा नहीं है................. मैं  बोली अब तक के पाप धो लेती हूँ आगे जब मुझसे पाप होगा तो फिर चले आयेंगे क्योंकि साधु लोग जब पाप करने से नहीं चूकते तो हम आम इंसान कैसे बचे रहेंगे , लेकिन सबसे मुख्य बात ये थी कि जिस सरोवर में हम अपना पाप धोने वाले थे वो इतना गन्दा था कि हाथ धोने का भी मन नहीं कर रहा था। किसी तरह जल हाथ में लेकर अपने ऊपर छिड़क लिए और अपने पाप अपने साथ वापस अपने घर लेते आये। 
                 दुःख इस बात का होता है कि प्रकृति ने जो उत्कृष्ट उपहार हमें प्रदान किया है उसे भी हम नहीं संभाल के रख रहे हैं , आखिर हम  इंसानों के कारण  ही ये सरोवर अपनी किस्मत पर रो रहा है। इतिहास की वो गाथा यहाँ सुप्त है जो सृष्टि की  रचना को स्पष्ट करती है और हमारे अस्तित्व का कारण  है। यही पर समुन्द्र मंथन हुआ था जिसका गवाह मंदार  पर्वत मौन रहकर भी कहानी को प्रमाणस्वरूप सुना रहा है।
                       समुन्द्र मंथन की कथा को प्रदर्शित करती झांकी 
 मंदार पर्वत की कहानी कहने से पहले मैं पापहारिणी सरोवर के मध्य में स्थित लक्ष्मी-नारायण मंदिर की  खूबसूरती दिखाना चाहती हूँ क्योकि यह  मंदिर और इसमें प्रतिष्ठित प्रतिमा अप्रतिम है और मैं बहुत ही प्रभावित हुई।  
                              लक्ष्मी - नारायण मंदिर 


                                  लक्ष्मी नारायण मंदिर 


अब मंदार पर्वत की  विशेषता बतलाती हूँ क्योकि इतिहास यहाँ प्रमाण के रूप में मौजूद है। समुन्द्र मंथन के समय यही मंदार मथानी बना था और शेषनाग इसके चारो ओर लिपटे हुए थे। आज भी ये निशान मंदार पर मौजूद हैं। 
                      मंदार पर्वत पर शेषनाग के लिपटने का निशान 


समुन्द्र मंथन से ही अमृत और विष दोनों प्राप्त हुए थे। विष तो भगवन शिव ने ग्रहण किया लेकिन अमृत के लिए देवता और दानव दोनों में  संघर्ष हुआ था और छल से देवताओं ने अमृत प्राप्त किया था। समुन्द्र मंथन के समय देवता लोग शेषनाग के पूंछ की  ओर  थे और दानव लोग मुख की ओर। ऐसी बुध्दिमानी देवताओं ने शेषनाग के विष से बचने के लिए किया था। 
             यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता मन मोह लेती है। बहुत ही मनोरम दृश्य है  साथ ही इतिहास की एक घटना का गवाह भी अतः मन में उत्सुकता थी इसे देखने की । सबसे ऊँची चोटी पर जैन मंदिर है जहाँ सीढ़ियों से जा सकते हैं।यहाँ भ्रमण का कार्यक्रम अद्भुत रहा। 


शनिवार, 16 नवंबर 2013

एक बूँद




एक बूँद  आँखों से छलका
 आँसू नाम दिया जग ने 
एक बूँद माँ की  आँखों में
 ममता नाम दिया जग ने          
एक बूँद विरहिन आँखों में
पीड़ा  नाम दिया जग ने
एक बूँद सीपी में गिरा जब 
मोती नाम दिया जग ने
एक  बूँद पत्तों पे दिखा तो
ओस की  बूँद कहा जग ने
एक  बूँद माथे से लुढ़का 

मेहनत नाम दिया जग ने
एक  बूँद बादल से गिरा तो
वर्षा नाम दिया जग ने
एक बूँद तो जल ही है
पर  अलग कहानी सबकी है
बूँदों  से रिश्ते बनते ही

हर बूँद का नाम दिया जग ने ................