बुधवार, 4 जुलाई 2012

सावन का पावन मास शिव का प्रिय मास

      सावन  का पावन मास शिव का प्रिय मास 


शिव देवों के देव अर्थात महादेव इनकी महिमा अपरम्पार है .  इनके शाश्वत स्वरुप का वर्णन अनंत है , जिसकी कोई सीमा नहीं है और हम इनके स्वरुप की जितनी गहराई में गोता लगाते हैं उतनी ही गहराई  में डूबते  जाते हैं . जिस अभूतपूर्व शांति को हम पाते हैं वो शिवमय होने के बाद ही मिलती है . आत्मा की शुद्धता और प्रेम  यही तो है जो हमें सुगमतापूर्वक उनके पास पहुंचाती है , भले ही मार्ग पथरीला हो पर फूल बिछे ही महसूस होते हैं और हम बाबा के द्वारे होते हैं बिलकुल उनकी भक्ति  में डूबे .  सुध कहाँ होती है किसी और बात की , मन तो बस बाबा में ही लगा होता है .
           बड़ा प्रिय लगता है बाबा को सावन मास क्योंकि समुद्र मंथन के पश्चात् विश्व की रक्षा हेतु हलाहल विषपान करना  पड़ा था और  इसके पश्चात् शीतलता इसी मास में मिलती है उन्हें , जब झमाझम बारिश से धरती शीतल बन जाती  है , चारो ओर  हरियाली छा जाती है तब भक्त भला पीछे क्यों रहें , वे भी उनका जलाभिषेक कर असीम कृपा प्राप्त करते हैं . शिव को प्रसन्न करने के लिए नाना कष्ट झेलते हुए भी उनके द्वार बोलबम का नारा लगाते  हुए पहुँच जाते हैं . कहा जाता है कि पार्वती को  भी शिव को प्रसन्न करने के लिए इसी माह कठोर साधना करना  पड़ा था तब जा कर भोले भंडारी उनके हुए .
                भगवन शिव का एक नाम  ''आशुतोष'' भी है जिसका अर्थ है ''आशु: तुष्यति इति आशुतोष:'' अर्थात जो अतिशीघ्र संतुष्ट हो जाय, वही शिव हैं. शिव के सहस्त्र  नामों का जप आत्मिक शुद्धि से करने वाला उनके सर्वाधिक सन्निकट पहुँच जाता  है और इसका अनुभव वह स्वयं ही कर सकता है .

बुधवार, 20 जून 2012

सुनहरे सपने

सुनहरे सपने 

 देखे जाते हैं कुछ सुनहरे सपने 
उगते सूरज से सुनहरे  
जीवन के  अपने, कुछ अपनों के
बुने  जाते है ताने - बाने रंगों के
और फिर जीवंत हो उठती है कल्पना
सुन्दरतम  अहसासों के साथ
धीमे - धीमे बढ़ते जाते
हमारे खवाबों के  दायरे 
आकार  ले  लेते पूनम की चाँद के
पूर्णता के साथ जीवन के  स्वरुप  को 
ढाल देते नित नए साँचे में सुनहरे  सपने ..............
 


शुक्रवार, 15 जून 2012


छुट्टियाँ क्या हुई बच्चों की दुनिया में एक नया जोश आया और  शैतानियों की  भरपूर लिस्ट तैयार थी . कोई  किसी से कम  नहीं था , एक से एक नए कारनामे होने लगे , अब इस बेचारी बिल्ली की शामत  आई थी  जो बच्चों के सामने आ गयी .......................................ये  तो होना ही था .
 
 दोस्ती बड़ी प्यारी होती है . आओ दोस्त साथ थोडा घूम ले .







छोटे नबाब को  फूल बड़े प्यारे लगते है .




 मै तो बड़ी अच्छी बिटिया हूँ ................................................
एक  छोटी सी गुडिया हूँ ................................


 मम्मी ये  मेरा खिलौना ले लिया ....................................................ऊँ ......ऊँ ..............
गले मिलकर सारे गिले - शिकवे दूर हो गए ........................अरे ...........ये तो जादू की झप्पी है ..................


शनिवार, 9 जून 2012

आओ पेंड लगायें हम

 आओ पेंड लगायें हम

आओ पेंड लगायें हम 
 धरती को  हरा  बनायें हम 
तपती धरती को मिलकर  फिर से 
 शीतल स्वर्ग बनायें हम 
 आओ पेंड लगायें हम 

इक छोटी बगिया हो अपनी 
जिसमे फूल लगायें हम 
फिर रंग - बिरंगी तितलियों के 
पीछे दौड़ लगायें हम 
आओ हरियाली लायें हम 
इक सुन्दर जहाँ बसायें  हम 

जहाँ कल - कल करती नदियाँ हों 
छोटी - छोटी सी तलैया हो 
फिर कागज की कश्ती को ले 
बारिश में तेज बहायें हम 
आओ पेड़ लगायें हम 
धरती को हरा बनायें हम

शनिवार, 12 मई 2012

          व्यथा 

 एक दर्द है  छिपा हुआ 
टीस उठती है बार-बार 
वेदना होती है भीतर तक 
स्पष्ट लकीरें चेहरे पर 
बाहर आने को फड़फड़ाते होठ 
पर गिर पड़े दो बूंद आंसू के 
और  बह गए दर्द 
पुन : दबी रह गयी व्यथा ।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

यादें धुंधली सी

यादें धुंधली  सी 

एक याद धुंधली सी........
बचपन कीअठखेलियों से
टकराकर लौटती हुई, 
खेतों की पगडंडियों से 
गुजरती हुई..............
कोयल की कुक से 
 सुर मिलाती हुई .......
अभी भी सिमटी है 
मन के किसी कोने में।

बड़े से आँगन में 
मिल बैठ  बातें करते
रिश्ते और नाते 
इन सब के बीच  
बचपन किसी के भी 
आँगन से निकलकर 
किसी के भी गोद में 
अधिकार से बैठता 
कुछ रिश्ते अपनाता।


समय ने करवट ली 
रिश्ते सिमटने लगे 
साथ में सिमटने लगी 
खिड़कियाँ, दरवाजे और आँगन 
एक निश्चित दायरा 
बचपन अब इसी में घूमता 
सोफे से पलंग तक
टीवी से फ्रिज तक
आँखे खोयी रहती 
गेमों की दुनिया में 
अब जीना है 
बचपन को सीमा में ।


बस्तों के बोझों से 
झुकते हुए कंधे 
न ममता की लोरी 
न दादी की थपकी 
न तारों से बातें 
न चंदा को ताने 
तितलियों के पीछे 
बोलो कौन भागे?
 
बस यादें बसी हैं 
धुंधली सी गाँव के 
बचपन की ।      
  

रविवार, 22 अप्रैल 2012

भागता बचपन

                        भागता बचपन 


              ब्लॉगर  साथियों नमस्कार । कुछ दिनों तक मै आपसब से दूर रही । बहुत जगह घूमना हुआ और इसके साथ मैंने आज की पीढ़ी के बच्चों का अध्ययन भी किया । जिस समस्या को लेकर मै चल रही थी, वो था आज के बच्चो का बदलता व्यवहार । यह कोई समस्या नहीं है बल्कि आज की बदलती जिन्दगी के बीच बच्चों में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक है । अब हम वैसे बच्चों को नहीं पाएंगे जो सिर्फ और सिर्फ बड़ों की छत्रछाया में रहें और उनके अनुसार ही चले । उनकी दुनिया भी हमारी तरह ही आगे भाग रही है बल्कि हमसे भी दो कदम आगे है । आज घर में पेन्ट कराना हो तो बच्चे ही रंग पसंद करते है , कोई गैजेट लेना हो तो सबसे पहले वे ही बताते है की लेटेस्ट क्या है ? कपड़ों से लेकर हमारे सभी पसंद पर बच्चे हावी हो गए है और हम उनपर बिलकुल निर्भर । यहाँ तक तो ठीक है , हम उनके तीव्र बुद्धि के कायल है , हमें अच्छा भी लगता है कि हमारे बच्चे अभी से ही हमारे सहायक हो गए हैं ।
                 हम बच्चों के हर फैसले को मानने लगे है लेकिन क्या बच्चे हमारे फैसले मान रहे है ? बिल्कुल नहीं और न ही उनमे आज्ञाकारिता का गुण ही नजर आता है । यह सही है कि सभी बच्चों पर यह लागु नहीं होती पर बहुतायत यही है । बच्चों को पॉकेट मनी अधिक चाहिए क्योंकि वे अपने दोस्तों से किसी भी हालत में कम नहीं रहना चाहते । माता पिता से अधिक उन्हें अपने दोस्तों कि बात अच्छी लगती है । यदि माता पिता उनके दोस्तों को नसीहत देते है तो वे इसे अपना अपमान समझने लगते हैं । दोस्तों के सामने उन्हें डांटना  भी नागवार गुजरता है और इसके लिए भी अपने माता पिता से लड़ने लगते है । एक आठ वर्षीय लड़के की बात मै बताती हूँ जिसे उसकी मम्मी ने धूप में क्रिकेट खेलने से मना किया और उसे उसके दोस्तों के बीच ही डांट दिया  । उसके बाद वो बच्चा अपनी माँ से लड़ पड़ा और इसी क्रम में कई घुसे भी माँ को जड़ दिए । क्रोध उसके अन्दर इतना था कि किसी की सुनने के लिए तैयार ही नहीं था । क्यों इतने उग्र होते जा रहें है आज के बच्चे ? वो संस्कार , वो बड़ो के आदर की परम्परा क्यों उनमे नहीं हो रही ?
                 दोस्तों के साथ पार्टी उनकी नयी चाहत बन गयी है। यह पार्टी भी कोई छोटी-मोटी नहीं होती बल्कि इसमें भी अपनी शान दिखाने की सोंच होती है । अब यदि उन्हें इसके लिए पैसे नहीं मिले तो घर में तूफान खड़ा हो जाता है । कैसे रोक लगेगी इन सब पर? हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं और हमारे बच्चे हमसे ही दूर होते जा रहे हैं । क्या इसके दोषी सिर्फ हम हैं ?