एक पगली
उस रोज की तरह
वह आज भी चिल्लायी ,
तड़पी , जी भर के रोयी ,
अपनी बेबसी , लाचारी ,
सिमटती खुशियों के बीच
उम्मीद की किरण की आस थी
पुनः मधुर प्रणय की प्यास थी
पर रिश्तों के धागे टूट चुके थे
उसकी तड़प को मान चुके थे
कि अब वो बन के रह गयी
बस एक पगली ...........बस एक पगली
उस पगली को रोज देखती हूँ और मन व्यथित हो जाता है , सोंचती हूँ इसका भी कोई परिवार होगा पर क्यों इसे ऐसे छोड़ दिया ?