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शनिवार, 23 फ़रवरी 2013



 

जिंदगी के सपने  

 चंदा से पूछकर
चांदनी चुरा लायी हूँ
घरौंदे में सजाकर
रौशनी फैलाई  हूँ। 

बादलों को रोककर
अभी अभी तो आयी  हूँ
जो आये वो तो
बरसने को बोल आयी  हूँ। 

चमन की हर कली  से पूछकर
अनेकों रंग लायी हूँ
भरके जिंदगी में उनको
वसंत - बहार लायी हूँ .

समय से पूछकर 
कुछ पल चुराके लायी हूँ
जो जी लूँ इसमें तो
अनमोल सुख मैं पायी हूँ। 

हया से पूछकर
लाली प्रेम की लायी हूँ
अधरों पे सजा के
प्रेमगीत गायी  हूँ .

पिया के प्रेम में रमकर
जोगन बन आयी  हूँ
डूबके गहराईयों में
प्रेमरस पायी हूँ। 


सपने मैं सजाकर  
जिंदगी की आयी  हूँ 
खुशियाँ हो बसंती 
ख्वाहिशें सजायी  हूँ। 












  

सोमवार, 12 मार्च 2012

ख्वाहिश 

खुशियाँ पाने की तमन्ना थी 
उड़कर बादलों से मिलने 
और कुछ कहने की लालसा थी ।

आसमान से सितारे तोड़कर 
किसी के आँचल में
 भर देने की इच्छा थी ।

तितलियों से रंग चुराकर 
जिन्दगी  रंगीन 
बनाने की ख्वाहिश थी। 

नदी की शांत जलधारा को 
अपने प्रियतम सागर से  
मिलने की व्यग्रता थी ।


किसी कली की मुस्कुराहट पर
एक भ्रमर बनकर 
गुंजन करने की चाहत थी ।



ऐ जिंदगी! तुझे भरपूर जीने के लिए 

मैं से हम बनकर 
कदम बढ़ने की जरुरत थी ।