अनकही
रह जाती है बहुत कुछ
अनकही
सुप्त, या फिर बेबस, बेचैन ,
शब्द बन जन्म लेते है जज्बात
मंथन गतिमान होता
उड़कर बाहर आने को आतुर
व्याकुल
होठों तक पहुँच काँप उठते
फिर भी अनकही रह जाती ,
ख़ामोशी
एक चादर तान देती
और छिप कर रह जाते
बहुत कुछ,
एक प्रयत्न पुन:
गतिमान
शब्दों का निर्मित स्वरुप
भावों की उड़ान
सागर की लहरों सा
संघर्ष
फिर भी रह जाती
अनकही ।