भगवान शिव का एक नाम आशुतोष भी है। इसका अर्थ है "आशु: तुष्यति इति आशुतोष:" , अर्थात जो अति शीघ्र संतुष्ट हो जाए, वही शिव है ।
शिव के शाश्वत स्वरुप का वर्णन अनंत है और हम इनके स्वरुप के जितनी गहराई में गोता लगाएँगे उतनी ही अनुभूति और अभूतपूर्व शांति मिलेगी । औघरदानी बाबा भोलेनाथ , अपने भोलेपन के लिए प्रसिद्ध हैं । बाबा के पास मनौतियों कि कमी नहीं होती और न ही भक्तों कि कमी होती है। ऐसे भी भक्त अनेको संख्या में हैं जो शारीर को नाना प्रकार से कष्ट देते हुए उनकी आराधना करते हैं और संभव है कि उनकी इच्छा पूर्ण भी होती है लेकिन हमारे भोले नाथ बस एस बार ह्रदय के सत्य पुकार पर भक्त की सुन लेते हैं।
शनिवार, 7 अगस्त 2010
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
शिव को जल क्यों चढाया जाता है
सावन मास आरम्भ हो चुका है और कवंरियों का जलाभिषेक के लिए गंगा जल ले जाने कि परम्परा शुरू हो चुकी है, लेकिन हम सभी जानते है कि भोलेनाथ को जल ही प्रिय है । जल ही जीवन है और हमारे प्रभु आम जनमानस को यह सन्देश भी देते है कि हमारा जीवन जल के बिना असंभव है। शिव के जल चढाने के बारे में एस कथा प्रसिद्ध है कि समुद्र मंथन के पश्चात निकले विष को देखकर सारे देवता भयभीत हो गए और शिव से रक्षा के लिए प्रार्थना क़ी तब शिव ने सृस्ति क़ी रक्षा के लिए विष का स्वयं पान कर लिया जिससे उनका कंठ नीला हो गया, तभी से वो नीलकंठ कहलाने लगे। विष पीने के पश्चात शिव के शरीर क़ी जलन को शांत करने के लिए उन्हें जल चढ़ाया जाता है। यह परम्परा कब से आरम्भ है कोई नहीं जानता लेकिन कहा जाता है कि प्रभु राम ने भी कांवर से जल यात्रा कर शिव का जलाभिषेक किया था।
सोमवार, 26 जुलाई 2010
सावन mahina और शिव की आराधना
param pita परमेश्वर का शिव swarup sarvjan priya है. प्रभु की आराधना me lin logon ke beec सावन ke पवित्र mas में kisi bhi tarah का bhedbhav nahi rahta है. प्रभु की आराधना का sarvotam rup झारखण्ड राज्य के देवघर जिले में dikhai deta है jahan प्रभु को बाबा बैधनाथ के nam se puja jata है. pure सावन mas में yeh pvitra nagri वृहत आराधना का केंद्र बन jati है. kone kone se log es nagri में aakar swayam को dhnya samjhte है.
सोमवार, 14 जून 2010
आस्था
जीवन जीने की कला हमारे स्वयं पर निर्भर करता है। हम चाहे जिंदगी को जिस रूप में जिए लेकिन जीते तो हैं । हमने महसूस किया है कि हमारे जीवन में एक मुख्य स्थान आस्था का है। जो लोग नास्तिक हैं वो भी किसी न किसी चीज पर विश्वास अवश्य रखते हैं, फिर आस्थ्वन की तो बात ही अलग है। हम अपने सारे दुःख एक आस्था के बल पर ही सह लेते हैं और अछे समय का इंतजार करते हैं । हमारे भीतर के बल को बढ़ाने का काम तथा विशेष परिस्थितियों से लड़ने की हिम्मत हम पाते हैं। यह आस्था कई रूपों में हमारे समछ आती है लेकिन हर रूप में हमें बल प्रदान करती है पर इसके स्वस्थ स्वरुप को अपनाना ही हमारे लिए उचित है.
सोमवार, 3 मई 2010
अनुभूति
सारे रास्ते बंद हो जाने के बाद जब हम परमपिता कि शरण में जाते हैं तो हमें असीम शांति कि अनुभूति होती है और यही हमें जीने के और भी रास्ते दिखाती है। हम न चाहते हुए भी उसी राह पर चल पड़ते हैं जिस पर हमारी आत्मा कहती है और हम इसे ही ईश्वर का सदेश मान बैठते हैं। यही हमारे जीने कि राह है।
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
शांति की खोज
शांति की खोज में हम कितना भटकते है फिर भी मन अशांत रहता है आखिर क्यों? मन की उलझान को असीम शांति की ओर ले जाने का हमारा प्रयास यह सूचित करता है कि हम वापस अपनी पुरातन परम्परा की ओर लौट रहें है. वेदों की जो प्राचीन परम्परा रही है वह अब हमें वापस अपनी ओर खीच रही और हम पुनह जप तप हवन की शरण में है। काफी अछा लग रहा है अपनी परम्परा को पुनह सँभालते.
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
Dharmik astha aur badhta ganga pradushan
yeh sach hai ki hamari astha hamari vishal evam vaibhvshali sanskriti ka stambh hai aur iske mul me svardik pujya ganga ka mahatvapurna sthan hai lekin kaphi dukh phuchta hai ganga ki durdsha dekhkar. jis ganga ki kalkal dhara evam vishal swarup hamare garv ka pratik tha vah aaj nale ka rup leti ja rahi hai. ganga ke dono kinaro ke beech ki simtti duria yeh bata rahi hai ki ganga hamse ruth kar ja rahi hai aur ham aphsos matr hi karte rahte hai.
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