शनिवार, 13 जुलाई 2013

   पहचान 



नदी  में चंचलता थी
नवयौवना सी तीव्रता थी
इतराती , बलखाती
प्रेयसी बन उतावला थी



सागर की व्यग्रता
उसे बार - बार खीचती
उठती - गिरती लहरों से
आमंत्रित करती



नदी की चाल और तेज होती
धाराएँ  बदल वो दौड़ लगाती
अपनी ही धुन में भागती
सागर की आगोश में जा गिरती



सागर से मिल नदी
मौन हो गयी
प्रेम में पागल थी
प्रेम में विलीन हो गयी



पर अब भी नदी बेचैन थी
सागर के दिल में कैद थी
आकुलता - व्याकुलता
आंदोलित मन, नदी की चाहत
अपनी पहचान की तड़प
क्योंकि नदी अपनी पहचान
सागर से मिल खो चुकी थी| 

24 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर भाव एवं अभिव्यति भी .....!!
    शुभकामनायें .

    उत्तर देंहटाएं
  2. किसी सूरत में चैन नहीं....
    यही तो जीवन है.

    सुन्दर रचना.

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब,सुंदर प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर चित्र और गहरे भाव !

    उत्तर देंहटाएं
  5. नदी की तो नियति ही यही थी ... उसकी चाह भी यही थी .. फिर भी अपनी पहचान को तडपती है ... शायद प्रेम को पूर्ण रूप से नहीं पहचान पाती ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार१६ /७ /१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं

  7. सुंदर प्रस्तुति...
    मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 19-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



    जय हिंद जय भारत...


    मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...


    यही तोसंसार है...

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर भाव का लाजवाब अभिव्यक्ति !
    latest post सुख -दुःख

    उत्तर देंहटाएं
  9. अपनी पहचान की तड़प
    क्योंकि नदी अपनी पहचान
    सागर से मिल खो चुकी थी|
    भावनाओं का अनूठा संगम ...........

    उत्तर देंहटाएं
  10. निसंदेह साधुवाद योग्य लाजवाब अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  11. आंदोलित मन, नदी की चाहत
    अपनी पहचान की तड़प
    क्योंकि नदी अपनी पहचान
    सागर से मिल खो चुकी थी|

    BAHUT HI SUNDAR RACHANA TIWARI JI ......AABHAR.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर भाव का लाजवाब अभिव्यक्ति !

    उत्तर देंहटाएं

  13. क्योंकि नदी अपनी पहचान
    सागर से मिल खो चुकी थी| -----

    भाव प्रधान बहुत सुंदर रचना
    बधाई

    आग्रह है
    केक्ट्स में तभी तो खिलेंगे--------

    उत्तर देंहटाएं
  14. खुबसूरत प्रकृति को शब्दों में बांधती रचना...
    खुबसूरत चित्र भी ......

    उत्तर देंहटाएं
  15. सागर से मिल नदी
    मौन हो गयी....
    -----------------
    अपना सब कुछ खोकर...हम सब की जिन्दगी भी तो ऐसी ही है ..
    बढ़िया लिखती हैं आप ....

    उत्तर देंहटाएं
  16. नदी अपनी पहचान सागर से मिलकर कहो चूँकि थी ,
    हम सभी नदिया जैसे ही हैं ,जिनका लक्ष्य ही सागर से मिलना हैं |
    आध्यत्म भरी पंक्तिया ,आभार
    एक शाम संगम पर {नीति कथा -डॉ अजय }

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत सुंदर रचना, साझा करने के लिए बहुत बहुत आभार

    यहाँ भी पधारे

    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_29.html

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत सुन्दर रचना...सीधे दिल को छू लेती है..

    उत्तर देंहटाएं