मंगलवार, 17 मई 2016

                    आत्मीयता


सुबह  का समय , टहलने वाले  लोगों की भीड़  पार्क में अपनी अपनी धुन में हैं। रोज  की  तरह  यंत्रवत जीवन , किसे फिक्र है कौन क्या  कर रहा है।  सभी अपनी दिनचर्या में मग्न हैं।  पार्क में प्रवेश  करते ही अनायास एक महिला पर नजर पड़  जाती है , वो मुझे बहुत खास लगती है क्योंकि औरों से  थोड़ी  अलग है। रोज की दिनचर्या में उसके सिर्फ  वो नहीं रहती , उसके साथ रहती है  औरोँ के प्रति आत्मीयता।  वो खूब जोर जोर  हँसती है , लगता है उसके साथ पार्क के सभी पेड़ पौधे भी शामिल हैं ,उसकी सुबह को खुशमिजाज बनाने को।  मंडली भी होती  उसके साथ लेकिन उसकी नजर अपनी मंडली  से बाहर भी होती ,पता  नहीं कैसे  वो जान जाती सबके मन के भाव और पढ़ लेती सभी चेहरे जो  लाख छुपना चाहे उससे। बेहद करीबी बन जाती वो, यही लगाव  और आत्मीयता खास बना देता है व्यक्तित्व को।
                                         आत्मीयता हो जाती है उसे पार्क  के कोने कोने से। एक भी कागज प्लास्टिक या अन्य कोई गन्दगी उसे रास नहीं आती और स्वयं लगती साफ करने ,उस समय गन्दा करने वाला स्वयं शर्मिंदा हो जाता है। ऐसे में उसके साथ कई हाथ सफाई में जुट  जाते हैं। एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करती  है  कि पार्क में प्रवेश करते ही अनायस  ही आँखे उसे ढूढ़ने लगती है। सबसे प्यारी होती है उसकी ठहाके वाली   हँसी ,मानो  सारे  दर्द ,तकलीफे वो  ठहाकों में नीले  आसमान  को  भेज देती है  बदले में पा लेती वो शक्ति  जो उसे ऊर्जावान बनाये रखती है।
                                     उमर कोई 55  से  60  होगी उसकी लेकिन चहरे पर शिकन भी नहीं , औरो में इतनी आत्मीयता क्यों नहीं होती।? आज परिवार एकल हो रहे है लेकिन  मन में  दूरियाँ  बढती जा रही है बदलती सोच संबंधो को अलग मोड दे रही है। फिर भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जिंदगी भरपूर जी लेते हैं।



      




                                                 
                       
 




मंगलवार, 25 अगस्त 2015

                                      बहुत दिनों के बाद 

  • बहुत दिनों के बाद आ   रही  हूँ। समय  ने  मेरे जीवन में ढेर  सारी खुशियाँ भर दी और मैं उसमें उलझ कर सबकुछ भूल गयी ,  वक्त को चाहती रही कि रोककर अपनी दिनचर्या में से थोड़ा सा पल कही और लगासकूँ पर उस नन्ही परी की आँखों में डूबते रहने का ही मन करता रहता। बहुत दिनों के बाद माँ बनी। ऐसा लगा अबतो उम्र अधिक हो गयी शायद मेरी जिंदगी अधूरी ही रहेगी लेकिन भगवान जब चमत्कार करते है तो विश्वास करना मुश्किल लगता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ  ,जब मै उम्मीद छोड़ चुकी थी और एक बेटी गोद ले चुकी थी जो मेरे भाई की बेटी थी तब भगवान ने मेरी गोद भर दी।  प्यारी सी बिटिया मनस्वी  की माँ बनी। आज वो  १० महीने की हो गयी। समय ने पिछले सारे  दर्द धो डाले और मै अपनी खुशियों में उलझ कर अपने सारे दर्द भूल गयी।  अपनी बिटिया मनस्वी के लिए एक छोटा सा नाम औरचाहिए मुझे जो मनस्वी के साथ जोड़नाः है ,अगर किसी के पास सुझाव है तो अवश्य भेजे। 

शनिवार, 9 अगस्त 2014

मेरे भैया




मेरे भैया 
        भेज दी है मैंने प्यार की डोर
        बाँध कर यादों के खजाने के साथ 
         सजेगी जब तुम्हारी कलाई 
                                              इस डोर से 
याद आएगी बहन 
पलकों की कोर में 
जब आंसू चमक  उठेंगे 
प्यार के रूप में 
तब जी उठेगा बचपन 
एक दिन के लिए 

                        मेरे भैया 
रोक लेना उस पल को 
थोड़ी देर के लिए भी 
कहीं दूर बैठी  ये बहन भी 
जी लेगी उस पल को जीभर  के 
संजो लेगी अपनी थाती के रूप में 
अगले राखी तक ..............