शनिवार, 12 मई 2012

          व्यथा 

 एक दर्द है  छिपा हुआ 
टीस उठती है बार-बार 
वेदना होती है भीतर तक 
स्पष्ट लकीरें चेहरे पर 
बाहर आने को फड़फड़ाते होठ 
पर गिर पड़े दो बूंद आंसू के 
और  बह गए दर्द 
पुन : दबी रह गयी व्यथा ।

बृहस्पतिवार, 26 अप्रैल 2012

यादें धुंधली सी

यादें धुंधली  सी 

एक याद धुंधली सी........
बचपन कीअठखेलियों से
टकराकर लौटती हुई, 
खेतों की पगडंडियों से 
गुजरती हुई..............
कोयल की कुक से 
 सुर मिलाती हुई .......
अभी भी सिमटी है 
मन के किसी कोने में।

बड़े से आँगन में 
मिल बैठ  बातें करते
रिश्ते और नाते 
इन सब के बीच  
बचपन किसी के भी 
आँगन से निकलकर 
किसी के भी गोद में 
अधिकार से बैठता 
कुछ रिश्ते अपनाता।


समय ने करवट ली 
रिश्ते सिमटने लगे 
साथ में सिमटने लगी 
खिड़कियाँ, दरवाजे और आँगन 
एक निश्चित दायरा 
बचपन अब इसी में घूमता 
सोफे से पलंग तक
टीवी से फ्रिज तक
आँखे खोयी रहती 
गेमों की दुनिया में 
अब जीना है 
बचपन को सीमा में ।


बस्तों के बोझों से 
झुकते हुए कंधे 
न ममता की लोरी 
न दादी की थपकी 
न तारों से बातें 
न चंदा को ताने 
तितलियों के पीछे 
बोलो कौन भागे?
 
बस यादें बसी हैं 
धुंधली सी गाँव के 
बचपन की ।      
  

रविवार, 22 अप्रैल 2012

भागता बचपन

                        भागता बचपन 


              ब्लॉगर  साथियों नमस्कार । कुछ दिनों तक मै आपसब से दूर रही । बहुत जगह घूमना हुआ और इसके साथ मैंने आज की पीढ़ी के बच्चों का अध्ययन भी किया । जिस समस्या को लेकर मै चल रही थी, वो था आज के बच्चो का बदलता व्यवहार । यह कोई समस्या नहीं है बल्कि आज की बदलती जिन्दगी के बीच बच्चों में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक है । अब हम वैसे बच्चों को नहीं पाएंगे जो सिर्फ और सिर्फ बड़ों की छत्रछाया में रहें और उनके अनुसार ही चले । उनकी दुनिया भी हमारी तरह ही आगे भाग रही है बल्कि हमसे भी दो कदम आगे है । आज घर में पेन्ट कराना हो तो बच्चे ही रंग पसंद करते है , कोई गैजेट लेना हो तो सबसे पहले वे ही बताते है की लेटेस्ट क्या है ? कपड़ों से लेकर हमारे सभी पसंद पर बच्चे हावी हो गए है और हम उनपर बिलकुल निर्भर । यहाँ तक तो ठीक है , हम उनके तीव्र बुद्धि के कायल है , हमें अच्छा भी लगता है कि हमारे बच्चे अभी से ही हमारे सहायक हो गए हैं ।
                 हम बच्चों के हर फैसले को मानने लगे है लेकिन क्या बच्चे हमारे फैसले मान रहे है ? बिल्कुल नहीं और न ही उनमे आज्ञाकारिता का गुण ही नजर आता है । यह सही है कि सभी बच्चों पर यह लागु नहीं होती पर बहुतायत यही है । बच्चों को पॉकेट मनी अधिक चाहिए क्योंकि वे अपने दोस्तों से किसी भी हालत में कम नहीं रहना चाहते । माता पिता से अधिक उन्हें अपने दोस्तों कि बात अच्छी लगती है । यदि माता पिता उनके दोस्तों को नसीहत देते है तो वे इसे अपना अपमान समझने लगते हैं । दोस्तों के सामने उन्हें डांटना  भी नागवार गुजरता है और इसके लिए भी अपने माता पिता से लड़ने लगते है । एक आठ वर्षीय लड़के की बात मै बताती हूँ जिसे उसकी मम्मी ने धूप में क्रिकेट खेलने से मना किया और उसे उसके दोस्तों के बीच ही डांट दिया  । उसके बाद वो बच्चा अपनी माँ से लड़ पड़ा और इसी क्रम में कई घुसे भी माँ को जड़ दिए । क्रोध उसके अन्दर इतना था कि किसी की सुनने के लिए तैयार ही नहीं था । क्यों इतने उग्र होते जा रहें है आज के बच्चे ? वो संस्कार , वो बड़ो के आदर की परम्परा क्यों उनमे नहीं हो रही ?
                 दोस्तों के साथ पार्टी उनकी नयी चाहत बन गयी है। यह पार्टी भी कोई छोटी-मोटी नहीं होती बल्कि इसमें भी अपनी शान दिखाने की सोंच होती है । अब यदि उन्हें इसके लिए पैसे नहीं मिले तो घर में तूफान खड़ा हो जाता है । कैसे रोक लगेगी इन सब पर? हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं और हमारे बच्चे हमसे ही दूर होते जा रहे हैं । क्या इसके दोषी सिर्फ हम हैं ? 

शनिवार, 24 मार्च 2012

परिंदा

                                         परिंदा 

यह नाम मेरी उस कविता का है जो कादम्बिनी में प्रकाशित हो चुकी है और मुझे बहुत ही प्रिय है इसीलिए  मै अपने ब्लॉग का नाम परिंदा रखी हूँ।

यह उस परिंदे को समर्पित है जो मेरे घर काफी दिनों से पिंजरे में था और आज उसने अंतिम सांसें भी उसी पिंजरे में ली। बहुत दुःख हुआ मुझे । उसका  चले जाना एक रिक्त स्थान का हो जाना है। शायद बहुत कुछ छूट गया मुझसे ------एक अधूरापन 


परिंदा 

चारो तरफ गोल-गोल चक्कर लगाया

एक निश्चित परिधि के अन्दर 

झल्लाकर सिमटे हुए पंख फद्फदाये 

उड़ने के लिए 

अफसोस उड़ न सका 

जोर-जोर से चिल्लाया 

गुंजायमान हो उठा दिगंत 

पर सुर की मधुरता न थी 

थी बस बेबसी और लाचारी 

छिन गया  था उससे उन्मुक्त गगन

पेड़ों पर फुदकना और मधुर संगीत 

कुछ नहीं था वहां 

था केवल एक पिंजरा 

जिसका वह था बंदी परिंदा 

मै साक्षी थी 

उसकी बेबसी, लाचारी 

क्रोध और झल्लाहट की 

कुछ दाने दे जाती चुगने के लिए 

तब वह स्वाभिमान से कटोरी पलट देता 

पुनः गिरे हुए दाने चुगता 

मानों हमें सन्देश देता 

अपनी स्वछंदता  का

समय के साथ वह भूलता गया 

पंख फदफदाना 

अपना लिया अपने हिस्से की जगह 

जिसमे सिमट कर रहना था 

अब वह पिंजरे से बाहर भी आता  

पर उड़ नहीं पता 

ख़त्म हो चुकी थी उसकी 

बेबसी और लाचारी 

समझौता कर लिया था परिस्थितियों से 

और भूल चूका था कि वह परिंदा है 

उन्मुक्त गगन का 

हम दोनों में एक ही समता थी 

परिस्थितियों से समझौता कर लेने की 

और अपने सामर्थ्य को भूल जाने की ।    

         



सोमवार, 12 मार्च 2012

ख्वाहिश 

खुशियाँ पाने की तमन्ना थी 
उड़कर बादलों से मिलने 
और कुछ कहने की लालसा थी ।

आसमान से सितारे तोड़कर 
किसी के आँचल में
 भर देने की इच्छा थी ।

तितलियों से रंग चुराकर 
जिन्दगी  रंगीन 
बनाने की ख्वाहिश थी। 

नदी की शांत जलधारा को 
अपने प्रियतम सागर से  
मिलने की व्यग्रता थी ।


किसी कली की मुस्कुराहट पर
एक भ्रमर बनकर 
गुंजन करने की चाहत थी ।



ऐ जिंदगी! तुझे भरपूर जीने के लिए 

मैं से हम बनकर 
कदम बढ़ने की जरुरत थी । 





 

मंगलवार, 28 फरवरी 2012

अनकही 

रह जाती है बहुत कुछ 
अनकही 
सुप्त, या फिर बेबस, बेचैन ,
शब्द बन जन्म लेते है 
जज्बात
मंथन गतिमान होता
उड़कर बाहर आने को आतुर  
व्याकुल 
होठों तक पहुँच काँप उठते 
फिर भी अनकही रह जाती ,
ख़ामोशी 
एक चादर तान देती 
और छिप कर रह जाते 
बहुत कुछ,
एक प्रयत्न पुन:
गतिमान 
शब्दों का निर्मित स्वरुप 
भावों की उड़ान
सागर की लहरों सा 
संघर्ष  
फिर भी रह जाती 
अनकही ।
  

शनिवार, 18 फरवरी 2012



जीवन में सुख

 क्यों री कोयल 
तुम फिर कूकने लगी 
                        अमराइयों में
मदमस्त बावरी सी 
अपने प्रियतम
ऋतुराज वसंत को 
                     रिझाने में।


                           







सुध बुध खोयी तुम 
फिरती हो इधर- उधर चंचल सी 
कुहुक- कुहुक उठती हो छिपकर 
                             मंजरियों में 
तुम जानती हो, तेरा प्रियतम 
पुनः चला जायेगा तुम्हें छोड़कर        
                        इन्हीं फिजाओं  में 
तब तुम प्रेमोन्नत हो 
मौन हो जाओगी , पुनः उसके 
                               विरह में
 फिर भी जी लेना चाहती हो तुम 
 एक एक पल अनुरक्त होकर 
एक सीख देती हुई 
की जीवन में सुख है 
                             थोड़ा पाने में ।