मंगलवार, 17 जुलाई 2012

अस्तित्व

अस्तित्व 

मैं स्वयं में '' मैं '' को तलाश रही थी 
पर मेरा '' मैं '' कब का हम बन चुका  था 
जुड़ चुका था रिश्तों की डोर से 
बंध  चुका था अपनों की ओर  से 
निकलने की तड़प बार-बार उठती 
फिर दबी रह जाती अपनों की शोर में 
टूटते और बनते सपने 
उड़ान भरती आशाएं 
दुर गगन को छूने की चाहत 
पर पुनः रोकती बाधाएँ  
बाँध लेती रिश्तों की डोर में 
खोजती रह जाती मैं  उनमें 
अपने अस्तित्व को................

21 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर अभिव्‍यक्ति !!
    रिश्‍तों के सुख में 'मैं' को भूलना ही पडता है ..

    एक नजर समग्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर भी डालें !!

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  2. naari jivan sampurn jagat ke astitv ka adhaar hai..fir bhi maun dharan kiye apne astitv ko tlash rahi hai...bahut sundar..

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  3. वाह: बहुत ही सारगर्भित रचना..संध्या जी..आभार

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  4. समाज और परिवार के दायित्यों के बीच "मैं" जाने कहा गुम हो जाता है......मगर इसे बचाए रखने में ही सुख है..
    सुन्दर भाव.
    अनु

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  5. हम में आने के बाद मैं कहां रह जाता है ... उअका अस्तित्व तो ह से बांध के ही रह जाता है ... मैं की छटपटाहट लिए उम्दा भाव ...

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  6. निरंतर एक खोज , प्राप्य फिर खोज

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  7. kabhi kabhi sw ko kho kar pehchan milti hai,,,..... sunder abhivyakti
    shubhkamnayen

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  8. रिश्तों की डोरी में बंधने के बाद 'मैं' कहीं खो ही जाता है और आप हम के क्षेत्र में विस्तार पाती हैं ..
    यह विस्तार एक तरह से अच्छा ही है ..
    लेकिन बंधन कभी भी सपनों की उड़ान में बाधा नहीं बननी चाहिए ..

    खुद को तलाशती सुंदर रचना !
    सादर !

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  9. बहुत ही सारगर्भित रचना,आभार.......

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    1. धन्यवाद........स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर

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  10. गहन भाव लिए रचना ..वैसे मै का खो जाना बुरा नहीं ..हम बन कुछ धनात्मक ही हो ..लेकिन हम क्यों कैसे किस के लिए याद रहे अपना अस्तित्व ..तो आनंद और आये ..सुन्दर
    भ्रमर ५

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    1. जिन्दगी में मै और हम के बीच अपनी पहचान बनानी होती है

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