सोमवार, 12 मार्च 2012

ख्वाहिश 

खुशियाँ पाने की तमन्ना थी 
उड़कर बादलों से मिलने 
और कुछ कहने की लालसा थी ।

आसमान से सितारे तोड़कर 
किसी के आँचल में
 भर देने की इच्छा थी ।

तितलियों से रंग चुराकर 
जिन्दगी  रंगीन 
बनाने की ख्वाहिश थी। 

नदी की शांत जलधारा को 
अपने प्रियतम सागर से  
मिलने की व्यग्रता थी ।


किसी कली की मुस्कुराहट पर
एक भ्रमर बनकर 
गुंजन करने की चाहत थी ।



ऐ जिंदगी! तुझे भरपूर जीने के लिए 

मैं से हम बनकर 
कदम बढ़ने की जरुरत थी । 





 

12 टिप्‍पणियां:

  1. एक से दो कदम ज्यादा अच्छे होते हैं पर कदम तो फिर भी अपने आप ही उठाना होता है ...
    जीने के लिए पहल खुद ही करनी चाहिए ...
    अच्छे भाव है रचना में ....

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  2. वाह ...बहुत ही अनुपम भाव संयोजन ...

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  3. बहुत सुन्दर....

    "मैं से हम" में ही तो सार्थकता है जीवन की...प्यार की...

    सादर.

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  4. ...मैं से हम बनकर ...

    सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ सार्थक सन्देश.
    सादर

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  5. हां,स्वीकार भाव और सामंजस्य से भौतिक जीवन ही नहीं,आध्यात्मिक जीवन भी सरल होता है।

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